ग्रह बल

ग्रहबल
वर का सूर्यबल और कन्या का गुरुबल तथा दोनों का चन्द्रबल देखना चाहिए। इसके विपरीत विवाह शुभ नहीं होता है |
सूर्यबल विचार
वर की जन्म राशि से ८, ४, १२ सूर्य रहने पर विवाह होने से वर का मरण होता है |
वर की राशि से १, २, ५, ७ के सूर्य रहने पर शान्ति (पूजन) से विवाह शुभ होता है |
वर की राशि से ११, ३, ६, १० राशि के सूर्य होने पर वह विवाह में शुभ होता है |
गुरुबलबल विचार
कन्या की राशि से ६, १२, ८ स्थान में बृहस्पति प्राणनाशक होते हैं, इसलिए शान्ति करके भी विवाह नहीं करना चाहिए |
भूमि पूजा करने पर कन्या की राशि से ६, १, १० स्थान में बृहस्पति हो तो अधिक पूजा करने पर शुभ होता है |
कन्या की राशि से ११, २, ५, ७, ९ स्थान में बृहस्पति हो तो शुभकारक होता है |
कन्या की संज्ञा
जन्म से अष्टम वर्ष में गौरी संज्ञा, नवम वर्ष में रोहिणी और दशम वर्ष में कन्या संज्ञा होती है। १० वर्ष के ऊपर रजस्वला होती है |
गुरुबल में गौरी, रविबल में रोहिणी और चन्द्रबल में कन्या का दान करना चाहिए | विशेष जानकरी के लिए यहाँ क्लिक करें
राशि कूटपरिहार
यदि वर की राशि से कन्या की राशि नौवीं और कन्या की राशि से वर की राशि पाँचवीं हो तो वर के पिता की और कन्या के माता की मृत्यु होती है तथा वर की राशि से कन्या की राशि तक ५ तथा कन्या की राशि से वर की राशि तक ९ हो तो इस प्रकार ‘नवपञ्चम’ पुत्र-पौत्र आदि सुख देने वाला हो जाता है तथा षडाष्टक मरणप्रद होता है,
इसका यत्न पूर्वक विचार करना चाहिए |https://youtube.com/shorts/SnsYLsI0IKQ?si=QAfaCAFgzcrqx_g5

अवर्गादि के गरुडादि स्वामी
अवर्ग (अ इ उ ऋ आदि १३ स्वर वर्ण) का स्वामी गरुड, कवर्ग (क ख ग घ ङ) का विडाल एवं प्रकार चवर्ग का सिंह, टवर्ग का कुक्कुट, तवर्ग का सर्प, पवर्ग का मूषक, यवर्ग (य र व ल) का मृग, शवर्ग (श ष स ह) का मेष स्वामी है। नाम के आदि अक्षर से वर-कन्या आदि का वर्ग समझना चाहिए
अंक वर्ग स्वामी
१ अवर्ग गरुड
२ कवर्ग विडाल
३ चवर्ग सिंह
४ टवर्ग कुक्कुट
५ तवर्ग सर्प
६ पवर्ग मूषक
७ यवर्ग मृग
८ शवर्ग मेष
वर्ग भेद से मित्र, शत्रु, सम ज्ञान
ऊपर आठ वर्ग कहे गये हैं, उनमें अपने वर्ग से 5वाँ शत्रु और 4था मित्र, बाकी वर्ग उदासीन समझना चाहिए। वर-कन्या या साझीदार, सेव्य-सेवक आदि के वर्ग परस्पर शत्रु हों तो त्याज्य है
भद्रा प्रमाण
कृष्णपक्ष की तृतीया और दशमी के पूर्वार्ध में तथा सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्ध में भद्रा रहती है और शुक्लपक्ष की एकादशी और चतुर्थी के पूर्वार्ध में तथा अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध में भद्रा रहती
राशि से भद्रानिवास
मेष, वृष, मिथुन और वृश्चिक के चन्द्रमा में भद्रा स्वर्ग में निवास करती है। कन्या, मकर, धनु और तुला के चन्द्रमा में पाताल में और कर्क, सिंह, कुंभ और मीन के चन्द्रमा में मृत्युलोक में भद्रा रहती है।
भद्रा निवास फल
मर्त्यलोक में भद्रा सम्मुख रहती है। स्वर्ग में ऊर्ध्वमुखी और पाताल में अधोमुखी रहती है। सम्मुख में मरणप्रदा होती है; इसलिए मर्त्यलोक में भद्रा हो तो सर्वदा त्याज्य है।
स्वर्ग में स्थित शुभ, पाताल में धनागम तथा मर्त्यलोक में स्थित भद्रा सर्व कार्य का नाश करती है।
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